Father of Nation M.K. Gandhi ji
गाँधी जी के विचार नैतिकवाद (Ethical), समाजवाद (Socialism) और व्यक्तिवाद (Individualism)
का मिश्रण है ।
उन्होंने पश्चिमी देशो के विचारको पीगू, मार्शल, रॉबिन्स
आदि की भाँति अर्थव्यवस्था को कल्याणकारी शास्त्र तो माना है मगर कल्याणकारी अर्थव्यवस्था Welfare Economy की प्राप्ति के उपायों के दृष्टिकोण से उनके विचार पाश्चात्य विचारको के विचारो से सर्वथा भिन्न थे।
पाश्चात्य विद्वानों ने भोतिक समृद्धि को काल्याणकारी अर्थव्यवस्था का आधार माना और इसके लिए उन्होंने अधिकाधिक आर्थिक विकास की नीति का समर्थन किया । परन्तु गांधी जी ने "सादा जीवन उच्च विचार"
Simple Living and High Thinking के सिध्दान्त को वास्तविक मानव कल्याण का स्त्रोत माना ।
उनका मत था कि भौतिक आवश्यकताओं को न्यूनतम करके मनुष्य वास्तविक सुख प्राप्त कर सकता है
इन आवश्यकताओं मे भोजन तथा वस्त्र प्रमुख है।
इसी लिए कृषि तथा खादी को उन्होंने अधिक महत्व दिया।
वे मौद्रिक मुल्य के स्थान पर मानव मूल्य Human Value को अधिक महत्व देते थे।
अध्ययन प्रणाली
पश्चिमी विद्वुने अर्थशास्त्र के अध्ययन के लिए आगमन Inductive और निगमन Deductive ... इन दो प्रणालियों को स्वीकार किया है , मगर गाँधी जी की अध्ययन प्रणाली इन प्रणालियों से पृथक एक अध्ययन प्रणाली है।
आलोचकों ने गांधी जी की प्रणाली को अवैज्ञानिक-काल्पनिक और अव्यावहारिक प्रणाली बताया है और कहा है कि अर्थशास्त्र के साथ नैतिकता का सम्मिश्रण सरवथा अनुपयुक्त है।
विकेन्द्रीकरण
गाँधी जी ने उधोगो के केन्द्रीय करण की बुराइयों को स्वयं देखा। केन्द्रीय करण का मतलब -एक ही प्रकार के उधोगो
के स्थान विशेष पर केन्द्रित हो जाने से है ।
गाँधी जी का मत था कि केन्द्रीयकरण बिना शक्ति के प्रयोग के नही चल सकता। बड़े पैमाने के उत्पादन से सट्टेबाजी तथा धोखेबाजी की प्रवृति को बल मिलता है।
जिससे अर्थव्यवस्था का आधार हिंसा और शोषण हो जाता है। इससे असन्तोष बड़ जाने पर मानव जीवन से सुख और शान्ति समाप्त हो जाती है।
मशीनो का प्रयोग
गाँधी जी ने आधुनिक तकनीकी सभ्यता को हिंसा, निराशा, असंतोष, क्रांतियो और युद्धो के लिए उत्तरदायी ठहराते थे। उन्होंने ने यन्त्रो की तुलना "साँप के बिलो" से की थी और आधुनिक सभ्यता को "शैतानो की सभ्यता" कह पुकारा।
वह भाई वह ये कोई बात नहीं हुई।।।
मशीनों के प्रयोग से जितना उत्पादन सैंकड़ों श्रमिक पृथक-पृथक करते है उतना उत्पादन एक दो श्रमिक ही कर डालते है
जिससे बेरोजगारी फैलती है।
मगर वास्तव मे गांधी जी मशीनों के विरुद्ध नहीं थे बल्कि मशीनों के बढ़ते हुए प्रयोग की प्रवृत्ति के विरोधी थे।।
ग्रामो मे पुनर्जीवन का संचार
गांधी जी ने ग्राम स्वराज की विचार धारा प्रस्तुत की थी। ग्राम स्वराज का मतलब गाँवो की आत्म-निर्भरता से है।
आर्थिक स्वतंत्रता
गाँधी जी राजनीतिक स्वतंत्रता की भाँति आर्थिक स्वतंत्रता को भी अनिवार्य बताते है वे व्यक्तिगत आर्थिक स्वतंत्रता के द्वारा
शोषण का अन्त कर देना चाहते थे। व्यक्ति बिना. किसी दबाव के चाहे जिस व्यापार को करें।।
सादा जीवन
गाँधी जी सादा जीवन , उच्च विचार (Simple living, high thinking) के समर्थक थे।।।।।
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